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Islamic Marriage Part 21 : निकाह के बाद पति-पत्नी के लिए इस्लामी शिक्षाऐं

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(बिस्मिल्लाहिर्रहमानिर्रहीम) प्रिय पाठकों,अस्सलामु अलइकुम वरहमतुल्लाहि वबरकातुहू! आज की इस पोस्ट में मानव जीवन के चैथे दौर ‘‘निकाह के बाद से अन्तिम समय तक’’ के सम्बन्ध में छः शिक्षाओं का उल्लेख किया गया है जिसमें आप लोगों को इस बात से अवगत कराया जा रहा है कि पत्नी को चाहिए कि वे अपने पति की जिन्सी भावनाओं का सम्मान करे ताकि पति अपने जिन्सी भावनाओं के प्रति बिगड़ने और भटकने से बच सके, और जिन्सी भेद खोलने की मनाही एवं रिश्तेदारों से पर्दा करने का उल्लेख भी किया गया है। अल्लाह तआला हम सभी को लिखने और पढ़ने से ज़्यादा अमल की तौफ़ीक़ अता फ़रमाये, आमीन! चैथा दौर – निकाह के बाद से अन्तिम समय तक निकाह के बाद जिन्सी दृष्टि से इन्सान के अन्दर सुकून, शान्ति और सन्तोष की स्थिति पैदा हो जानी चाहिए फिर भी इसका दारोमदार पति पत्नी के अपासी रवैयों पर है इसलिए इस अवसर पर भी इस्लाम दोनों पक्षों की जिन्सी भावनाओं को बिगड़ने व भटकने से बचाने के लिए पूरी-पूरी रहनुमाई करता है। निकाह के बाद पति-पत्नी के लिए इस्लामी शिक्षाऐं इस प्रकार हैं- 1. पति की जिन्सी भावनाओं का सम्मान 2. चार शादियों की इजाज़त 3. पति के ...

Islamic Marriage Part 20 : इस्लाम में निकाह का महत्व और आसान तरीक़ा

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(बिस्मिल्लाहिर्रहमानिर्रहीम) प्रिय पाठकों, अस्सलामु अलइकुम वरहमतुल्लाहि वबरकातुहू! अब हम आपकी खि़दमत में पेश कर रहे हैं मानव जीवन के तीसरे दौर में जिन्सी बुराइयों और गन्दिगी से पाक व साफ़ रखने के दस आदेशों में से आदेश नं0 8, 9 और 10, जिसमें आप लोगों को निकाह का हुक्म और निकाह का विकल्प से अवगत कराया गया है साथ ही नफ़्स के सुधार और पाकीज़गी के ताल्लुक़ से क़ुरआन और सुन्नत की रोशनी में उल्लेख किया गया है। आदेश नं0 8: निकाह का हुक्म व्यक्ति के नफ़्स के सुधार और पाकी की विभिन्न तदबीरें अपनाने के साथ इस्लाम निकाह करने का हुक्म भी देता है जो कि न केवल पारिवारिक व्यवस्था की शक्तिशाली और सुदृढ़ बुनियाद बनता है बल्कि इन्सान के अन्दर शर्म व लज्जा और सतीत्व की भावना भी पैदा करता है। अल्लाह के नबी सल्ल0 का इरशाद है- ‘‘निकाह आंखों को नीचा करता है और शर्मगाह को बचाता है।’’ (मुस्लिम) और आप सल्ल0 ने इरशाद फ़रमारया- ‘‘निकाह आधा दीन है।’’ (बैहक़ी) निकाह के महत्व को देखते हुए इस्लाम ने निकाह का तरीक़ा बड़ा सरल व सहज रखा है न मेहर की हद न दहेज की पाबन्दी न बारात का झंझट न ज़बान, रंग व नस्ल, क़ौम, क़बीला क...

Islamic Marriage Part 19 : दो धारी शैतानी हथियार, चलती फिरती तस्वीरें

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(बिस्मिल्लाहिर्रहमानिर्रहीम) प्रिय पाठकों, अस्सलामु अलइकुम वरहमतुल्लाहि वबरकातुहू आज की हमारी पोस्ट में मानव जीवन के तीसरे दौर में जिन्सी बुराइयों और गन्दिगी से पाक व साफ़ रखने के दस आदेशों में से आदेश नं0 7 के आठ प्वाइंट्स का उल्लेख किया गया है जिसमें आप लोगों को इस बात से अवगत कराया जा रहा है कि समाज में नज़र आने वाली छोटी-छोटी बुराइयां किस क़दर ख़तरनाक और गुनाह का सबब हैं जिनसे आज हम इंसान बचने की कोशिश नहीं करते हैं और आज ये बुरे और फ़हश काम हद से तजावुज़ कर चुके हैं जैसे कि औरत का ख़ुश्बू लगाकर बाज़ारों और मिली जुली मेहफ़िलों शामिल होना, ग़ैर मेहरम के साथ मिलना जुलना व छूना, अपनी शोभा का प्रदर्शन करना, गाने बजाने आदि शैतानी हथकंडों से हम सभी को बचना चाहिए, ऐसे कामों से अल्लाह और उसके रसूल सल्लल्लाहु अलइहि वसल्लम ने सख़्ती से मना फरमाया है। अल्लाह तआला हम सभी को इन तमाम बुरे फ़ह्श और शैतानी कामों से बचने की तौफ़ीक़ अता फ़रमाये, आमीन! आदेश नं0 7: कुछ अन्य आवेश वढ़ाने वाले कामों की मनाही (1) ख़ुश्बू लगाकर घर से निकलने की मनाही- नबी सल्ल0 का इरशाद है- ‘‘जो औरत नमाज़ के लिए मस्जिद जाना...

Islamic Marriage Part 18 : आंखें शैतान की तीरों में से एक ज़हरीला तीर

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प्रिय पाठकों, अस्सलामु अलइकुम वरहमतुल्लाहि वबरकातुहू! इस पोस्ट में मानव जीवन के तीसरे दौर में जिन्सी बुराइयों और गन्दिगी से पाक व साफ़ रखने के दस आदेशों में से आदेश नं0 5 और 6 का उल्लेख किया गया है जिसमें आप लोगों को इस बात से अवगत कराया जा रहा है कि समाज में मिली जुली महफ़िलें सजाना और मर्द व औरत का एक दूसरे से नज़रें मिलाना और चोरी छुपे मिलना जुलना ये सब शैतानी हथकंडे हैं इनसे और इन जैसे तमाम बुरे और फ़ह्श कामों से हम सभी को बचना चाहिए, ऐसे कामों से अल्लाह और उसके रसूल सल्लल्लाहु अलइहि वसल्लम ने सख़्ती से मना फरमाया है। अल्लाह तआला हम सभी को शैतानी हथकडों से बचने की तौफ़ीक़ अता फ़रमाये, आमीन! Let’s start Islamic Marriage Part 18– अब आपकी खि़दमत में पेश है- बिस्मिल्लाहिर्रहमानिर्रहीम अलहम्दु लिल्लाहि रब्बिल आलमीन वस्सलातु वस्सलामु अला सय्यिदिल मुर्सलीन वल आक़िबतु लिल मुत्तक़ीन, अम्मा बाद! आदेश नं0 5: ग़स्से बसर (नज़रें मिलाना) समाज को जिन्सी आवेश और बिखराव से पाक व साफ़ रखने के लिए पर्दा एक ज़ाहिरी तदबीर है जबकि ‘‘ग़स्से बसर’’ का हुक्म एक बातिनी तदबीर है जिस पर सारे मर्द व औरतें अपने-...

Islamic Marriage Part 17 : बुराई का कैंसर फैलाने का सबसे बड़ा कारण "बेपर्दगी"

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(बिस्मिल्लाहिर्रहमानिर्रहीम) अलहम्दु लिल्लाहि रब्बिल आलमीन वस्सलातु वस्सलामु अला सय्यिदिल मुर्सलीन वल आक़िबतु लिल मुत्तक़ीन, अम्मा बाद! आदेश नं0 2: सातिर लिबास पहनने का हुक्म घर के आम चैबीस घंटों के जीवन में इस्लाम ने मर्दों और औरतों को यह हुक्म दिया है कि वे ऐसा लिबास इस्तेमाल करें कि जिससे उनका सतर (शरीर का विशेष भाग) खुलने न पाए। स्पष्ट रहे कि मर्द का सतर नाड़ी से घुटनों तक हैं नबी सल्ल0 का इरशाद है- ‘‘मर्द का नाड़ी के नीचे और घुटने के ऊपर (का हिस्सा) सब छुपाने योग्य है जबकि औरतों का सतर हाथ पांव और चेहरे के अलावा सारा शरीर है। औरतों को नबी सल्ल0 ने यह हुक्म दिया है कि ‘‘जब औरत व्यस्क हो जाए तो उसके शरीर का कोई अंग नज़र नहीं आना चाहिए सिवाए चेहरे और कलाई के जोड़ तक।’’ (अबू दाऊद) सातिर लबास में यह बात भी शामिल है कि लिबास इतना तंग और बारीक या छोटा न हो जिससे शरीर के अंग ज़ाहिर हो रहे हों। नबी सल्ल0 का इरशाद है कि ऐसी औरतें जो कपड़े पहनने के बावजूद नंगी रहती हैं जन्नत में दाखि़ल न होंगी, न ही जन्नत की ख़ुश्बू पाएंगी।’’ (मुस्लिम) याद रहे कि सातिर लिबास का यह हुक्म घर के अन्दर मेहरम रिश...

Islamic Marriage Part 16 : जन्म से व्यस्क तक औलाद की परवरिश

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Raising children from birth to adult (बिस्मिल्लाहिर्रहमानिर्रहीम) अलहम्दु लिल्लाहि रब्बिल आलमीन वस्सलातु वस्सलामु अला सय्यिदिल मुर्सलीन वल आक़िबतु लिल मुत्तक़ीन, अम्मा बाद! दूसरा दौर – जन्म से लेकर व्यस्क होने तक बच्चे की पैदाइश पर सबसे पहले उसके दाएं कान में अज़ान और बाएं कान में इक़ामत कहने की हिदायत की गयी है और फिर किसी नेक व दीन का ज्ञान रखने वाले से तहनीक (कोई मीठी चीज़ जैसे खजूर आदि चबाकर बच्चे के मुंह में डालने को तहनीक कहते हैं) और बरकत की दुआ कराना मसनून है। सातवें दिन बच्चे की ओर से अल्लाह के नाम पर जानवर ज़िब्ह करना (अक़ीक़ा करना) और अच्छा नाम रखना मसनून है। मनो वैज्ञानिकों के निकट अच्छे नाम इन्सान के व्यक्तित्व और चरित्र पर बड़े गहरे प्रभाव डालते हैं। आप सल्ल0 का इरशाद है- ‘‘अल्लाह के निकट सबसे अधिक पसन्दीदा नाम अब्दुल्लाह और अब्दुर्रहमान है।’’ (मुस्लिम) ये सारे काम बच्चे को एक पाकीज़ा, भाग्यवान और भला जीवन प्रदान कराने में बड़ा अहम रोल अदा करते हैं। नबी सल्ल0 का इरशाद है- ‘‘जब बच्चा सात साल का हो जाए तो उसे नमाज़ पढ़ने का हुक्म दो। दस साल की उम्र में नमाज़ न पढ़े तो उसे म...

Islamic Marriage Part 15 : मानव जीवन के चार दौर और शिक्षा प्रद घटना

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The Four Stages of Human Life and the Enlightening Event (बिस्मिल्लाहिर्रहमानिर्रहीम) अलहम्दु लिल्लाहि रब्बिल आलमीन वस्सलातु वस्सलामु अला सय्यिदिल मुर्सलीन वल आक़िबतु लिल मुत्तक़ीन, अम्मा बाद! इस्लाम की प्रशिक्षण व्यवस्था व्यक्ति के समूह का नाम समाज है और व्यक्ति समाज का एक अटूट अंग है। इस्लाम समाज के सुधार का आरंभ करता है ताकि चरित्रवान और भले लोग तैयार होकर एक पाकीज़ा व स्वस्थ समाज का निर्माण हो सके। व्यक्ति के सुधार के लिए इस्लाम की प्रशिक्षण व्यवस्था को समझने के लिए मानव जीवन को चार दौरों में विभाजित किया जा सकता है। 1. पहला दौर – गर्भ ठहरने से लेकर जन्म तक 2. दूसरा दौर – जन्म से लेकर व्यस्क होने तक 3. तीसरा दौर – व्यस्क आयु से निकाह तक 4. चैथा दौर – निकाह के बाद से अन्तिम सांस तक पहला दौर – गर्भ ठहरने से लेकर जन्म तक यह एक ठोस हक़ीक़त है कि औलाद का सौभाग्य या दुष्टता बड़ी हद तक मां-बाप की दीनदारी, ईशभय, सदाचार, चरित्र एवं शिष्टाचार पर निर्भर होती है मां-बाप में से भी मां-बाप के दृष्टिकोण, भावनाएं, बुद्धिमानी, आचरण की छाप औलाद पर बाप की तुलना में अधिक गहरी होती है। इस तथ्य को सामने...

Islamic Marriage Part 14 : क्या ससुराल की सेवा करना वाजिब नहीं

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 Isn’t it fair to serve in-laws? (बिस्मिल्लाहिर्रहमानिर्रहीम) अलहम्दु लिल्लाहि रब्बिल आलमीन वस्सलातु वस्सलामु अला सय्यिदिल मुर्सलीन वल आक़िबतु लिल मुत्तक़ीन, अम्मा बाद! क्या शरअी तौर पर ससुराल की सेवा करना वाजिब नहीं? मतलब यह होता है कि अब उम्र भर के लिए तुम्हारा मरना जीना दुख सुख ख़ुशी और ग़मी उसी घर से जुड़ी है। इस नसीहत का नतीजा यह निकलता है कि बहु अपने पति के मां-बाप को अपने मां-बाप जैसा आदर सम्मान देती और उनकी सेवा में कोई कमी न होने देती और इस तरह सास बहु की पारम्परिक नोक झोंक के बावजूद लोग शान्ति और सुख का जीवन बसर करते थे जब से पश्चिमी सभ्यता के अनुसरण का शौक़ पैदा हुआ है तब से एक नयी सोच ने जन्म लेना शुरू कर दिया है वह यह कि शरअी तौर पर औरत पर ससुराल की सेवा करना वाजिब नहीं और यह कि पति के लिए खाना पकाना कपड़े धोना और अन्य काम (घरेलू) करना भी पत्नी पर वाजिब नहीं, न ही पति इन बातों की मांग कर सकता है। क्या वास्तव में ऐसा ही है? आइए नक़ली और अक़ली दलीलों की रोशनी में जायज़ा लें कि यह ‘‘फ़तवा’’ इस्लामी शिक्षाओं के अनुसार है या शरीअत के नाम पर पश्चिमी सभ्यता का अनुसरण का शौक़।...

Islamic Marriage Part 13 : डोली और जनाज़ा, मां बाप, ससुर और सास के अधिकार

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The rights of Doli and Janaza, parents, father-in-law and mother-in-law (बिस्मिल्लाहिर्रहमानिर्रहीम ) अलहम्दु लिल्लाहि रब्बिल आलमीन वस्सलातु वस्सलामु अला सय्यिदिल मुर्सलीन वल आक़िबतु लिल मुत्तक़ीन, अम्मा बाद! औरत मां के रूप में एक सहाबी नबी सल्ल० की सेवा में हाज़िर हुए और कहा- “ऐ अल्लाह के रसूल सल्ल० मेरे सदव्यवहार का सबसे अधिक हक़दार कौन है आपने फ़रमाया- तेरी मां। उसने दोबारा पूछा- “फिर कौन आपने फ़रमाया- तेरी मां। उसने तीसरी बार पूछा- “फिर कौन आपने फ़रमाया- तेरी मां। उसने चौथी बार पूछा- फिर कौन आपने फ़रमाया- “तेरा बाप।” (बुख़ारी) पारिवारिक व्यवस्था में औरत को मर्द पर तीन दर्जों की यह श्रेष्ठता इस्लाम की ओर से दिया गया वह सम्मानित और इज़्ज़त का मक़ाम है कि दुनिया भर की “महिला अधिकार संस्थाएं सदियों तक संघर्ष करती रहें तब भी उन्हें दुनिया का कोई देश, कोई धर्म और कोई क़ानून यह मक़ाम देने के लिए तैयार नहीं होगा। मुसलमान घराने में औरत निकाह के बन्धन में बन्ध कर अपने व्यवहारिक जीवन में क़दम रखती है तो उसे मर्द का शक्तिशाली सहारा मिल जाता है। उसके सन्तान होती है तो उसकी इज़्ज़त और मान सम्मा...

Islamic Marriage Part 12 : औरतों को मर्दों के असमान अधिकार - 02

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 Unequal rights for women to men (बिस्मिल्लाहिर्रहमानिर्रहीम ) अलहम्दु लिल्लाहि रब्बिल आलमीन वस्सलातु वस्सलामु अला सय्यिदिल मुर्सलीन वल आक़िबतु लिल मुत्तक़ीन, अम्मा बाद! 3. विरासत शरीअत ने औरत को हर हाल में सुरक्षा उपलब्ध की है। यदि वह पत्नी है तो उसका सारा ख़र्च पति के ज़िम्मे है, माँ है तो बेटे के ज़िम्मे है, बहन है तो भाई के ज़िम्मे है, बेटी है तो बाप के ज़िम्मे है। पत्नी होते हुए वह न केवल मेहर की हक़दार है बल्कि यदि कोई औरत जागीर की मालिक है और पति फाक़ा कर रहा हो तब भी शरअी रूप से पत्नी घर पर एक पैसा तक ख़र्च करने की पाबन्द नहीं। मर्द की इन ज़िम्मेदारियों और औरत के इन अधिकारों को सामने रखते हुए इस्लाम ने औरत को विरासत में मर्द के मुक़ाबले आधा हिस्सा दिया है। अल्लाह का इरशाद है- ‘‘मर्द का हिस्सा दो औरतों के हिस्से के बराबर है।’’ (सूरह निसा-11) 4. स्मण शक्ति और नमाज़ों की कमी एक बार नबी अकरम सल्ल० ने औरतों को सम्बोधित करते हुए फरमाया- “औरतों! सदक़ा करो और इस्तग़फ़ार किया करो। मैंने जहन्नम में मर्दो की तुलना में औरतों को अधिक देखा है। एक औरत ने कहा- “ऐ अल्लाह के रसूल (सल्ल0)! इस...

Islamic Marriage Part 11 : औरतों को मर्दों के असमान अधिकार – 01 : Unequal rights for women to men

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(बिस्मिल्लाहिर्रहमानिर्रहीम ) अलहम्दु लिल्लाहि रब्बिल आलमीन वस्सलातु वस्सलामु अला सय्यिदिल मुर्सलीन वल आक़िबतु लिल मुत्तक़ीन, अम्मा बाद! 1. परिवार का मुखिया होना इस्लाम मर्द और औरत दोनों की शारीरिक बनावट और प्राकृतिक क्षमताओं को सामने रखते हुए दोनों के कार्य क्षेत्र का निर्धारण करता है। इस्लाम का दृष्टिकोण यह है कि मर्द और औरत अपनी अपनी शारीरिक बनावट और भौतिक गुणों के आधार पर अलग अलग उद्देश्यों के लिए पैदा किए गए हैं। शारीरिक बनावट की दृष्टि से प्रौढ़ अवस्था के बाद मर्दों के अन्दर कोई शारीरिक परिवर्तन नहीं होता सिवाए इसके कि चेहरे पर दाढ़ी और मूंछ के बाल उगने लग जाते हैं और उनके अन्दर जिन्सी भावनाएं जाग जाती हैं जबकि औरत के अन्दर प्रौढ़ अवस्था के बाद जिन्सी जागरूकता के अलावा बड़े प्रमुख परिवर्तन हो जाते हैं वे यह कि औरत को हर महीने मासिकधर्म का ख़ून आने लगता है जिससे उसकी शारीरिक व्यवस्था में कुछ परिवर्तन भी पैदा हो जाते हैं। औरत का श्वांस, पाचन, पट्ठों की व्यवस्था, ख़ून की गर्दिश, मानसिक व शारीरिक क्षमताएं मानो पूरा शरीर उससे प्रभावित होता है। व्यस्क मर्द व औरतें अच्छी तरह जानते हैं क...

Islamic Marriage Part 10 : इस्लाम में औरतों को मर्दों के समान अधिकार

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In Islam, women have the same rights as men. ( बिस्मिल्लाहिर्रहमानिर्रहीम ) अलहम्दु लिल्लाहि रब्बिल आलमीन वस्सलातु वस्सलामु अला सय्यिदिल मुर्सलीन वल आक़िबतु लिल मुत्तक़ीन, अम्मा बाद! 3. भलाई का सवाब भले कर्माें के सवाब में मर्द व औरत पूरी तरह समान हैं। अल्लाह का इरशाद है- ‘‘जो नेक काम करेगा चाहे मर्द हो या औरत बशर्ते कि वह मोमिन हो ऐसे सब लोग जन्नत में दाखि़ल होंगे जहाँ उन्हें बे हिसाब रिज़्क़ दिया जाएगा।’’ (सूरह ग़ाफ़िर – 40) एक दूसरी आयत मे इरशाद है- ‘‘मर्दों और औरतों में से जो लोग सदक़ा देने वाले हैं और जिन्होंने अल्लाह को कर्ज़े हसना दिया है उन सबको निश्चय ही कई गुना बढ़ाकर दिया जाएगा और उनके लिए बेहतरीन बदला है।’’ (सूरह हदीद – 18) सूरह आले इमरान में अल्लाह का इरशाद है- ‘‘मैं तुममें किसी का अमल बर्बाद नहीं करता चाहे मर्द हो या औरत तुम सब एक दूसरे के जिन्स से हो।’’ (आले इमरान – 195) इस्लाम में कोई अमल ऐसा नहीं जिसका सवाब मर्दों को केवल इसलिए ज़्यादा दिया गया हो कि वे मर्द हैं और औरतों को इसलिए कम दिया गया है कि वे औरतें हैं बल्कि इस्लाम ने फ़ज़ीलत का पैमाना तक़वा को बनाया है। यदि को...

Islamic Marriage Part 09 : औरत की आज़ादी के असल प्रेरक

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औरत की आज़ादी के असल प्रेरक, मर्द और औरत में समानता The real motivator of women’s freedom,  Equality between man and woman   बिस्मिल्लाहिर्रहमानिर्रहीम अलहम्दु लिल्लाहि रब्बिल आलमीन वस्सलातु वस्सलामु अला सय्यिदिल मुर्सलीन वल आक़िबतु लिल मुत्तक़ीन, अम्मा बाद! पश्चिम में औरत की आज़ादी के असल प्रेरक क्या हैं? पश्चिम में औरत मर्द के बीच समानता का मतलब यह है कि औरत हर जगह मर्द के कांधा से कांधा मिलाकर खड़ी नज़र आ जाए। दफ़्तर हो या दुकान, फ़ैक्ट्री हो या कारख़ाना, होटल हो या क्लब, पार्क हो या मनोरंजन स्थल, नाचघर हो या प्ले ग्राउंड औरत मर्द की समानता की आज़ादी या औरतों के अधिकारों का यह फ़लसफ़ा बघारने की असल ज़रूरत औरत को नहीं बल्कि मर्द को पड़ी है जिसके सामने दो ही उद्देश्य थे एक औद्योगिक क्रान्ति के लिए फ़ैक्ट्रियों और कारख़ानों की पैदावार में वृद्धि, दूसरे जिन्सी लज़्ज़त की प्राप्ती। दूसरे शब्दों में पश्चिम में औरत की आज़ादी के आन्दोलन का असल प्रेरक दो ही चीज़ें हैं ‘‘पेट और शर्मगाह’’। तथ्य तो यह है कि पश्चिम के लोगों का सारा जीवन इन्हीं दो चीज़ों के चारों ओर धूम रहा है* * क़ुरआन...

Islamic Marriage Part 08 : क्या संरक्षक के बिना निकाह जायज़ है?

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बिस्मिल्लाहिर्रहमानिर्रहीम अलहम्दु लिल्लाहि रब्बिल आलमीन वस्सलातु वस्सलामु अला सय्यिदिल मुर्सलीन वल आक़िबतु लिल मुत्तक़ीन, अम्मा बाद! निकाह में संरक्षक की रज़ामंदी व अनुमति निकाह के आयोजन के लिए आज तक इस्लामी और पूर्वी परम्परा भी यही रही है कि बेटियों के निकाह पिता की मौजूदगी में घरों पर आयोजित होते। दोनों परिवारों के बुज़ुर्गों की मौजूदगी में बेटियां नेक आशीर्वाद व तमन्नाओं के साथ बड़े सम्मान व इज़्ज़त के साथ घरों से विदा होतीं और माँ-बाप अल्लाह के सामने शुक्र का सज्दा करते कि जीवन का महत्वपूर्ण कर्तव्य पूरा हो गया माँ-बाप के चेहरों पर गंभीर इत्मीनान और सन्तुष्टि की निशानियाँ मौजूद होतीं लेकिन जब से पश्चिम की कुरूप व गन्दी सभ्यता ने देश के अन्दर अपना प्रभाव जमाना आरंभ किया है तब से निकाह का एक और तरीक़ा प्रचलित होने लगा है। लड़का-लड़की चोरी छुपे प्यार करते हैं। एक साथ मरने जीने की क़समें खाते हैं। माँ-बाप से बग़ावत करके भागने की योजना बनती है और एक-आध दिन कहीं छुपे रहने के बाद अचानक लड़का और लड़की अदालत में पहुँच जाते हैं। ग्रहण और स्वीकृति होती है और अदालत एक फ़तवे के साथ कि ‘‘संरक्ष...

Islamic Marriage Part 07 : इंसान इंसान ही रहे जानवर न बनने पाए

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इंसान इंसान ही रहे जानवर न बनने पाए; आत्महत्या के रूझान में वृद्धि; इस्लाम क्या चाहता है?; मसनून ख़ुत्बा निकाह बिस्मिल्लाहिर्रहमानिर्रहीम अलहम्दु लिल्लाहि रब्बिल आलमीन वस्सलातु वस्सलामु अला सय्यिदिल मुर्सलीन वल आक़िबतु लिल मुत्तक़ीन, अम्मा बाद! आत्महत्या के रूझान में वृद्धि इस ब्रहमांड को बस में करने के जुनून में फंसी लेकिन इस सृष्टि के स्वामी की बाग़ी क़ौमों को इस संसार के स्वामी ने जीवन की सबसे बड़ी दौलत ‘‘सुख़’’ से वंचति कर रखा है। भोग विलासी, शराब व ज़िना में लिप्त, हसब व नसब से वंचति पश्चिमी क़ौमों की नयी नस्लें अपराधी, निराश और डेपरेशन का शिकार होकर आत्महत्या में अपनी नजात तलाश कर रही हैं।1 बी.बी.सी. की एक रिपोर्ट के अनुसार इस समय अमेरिका में 20 लाख नौजवान ऐसे हैं जो अपना शरीर घायल करके सुख शान्ति पाते हैं। इनमें 11 प्रतिशत लड़कियाँ हैं। माहिरों के कथ्नानुसार उनकी यह हालत सख़्त निराश और डेप्रेशन की वजह से है। 1963 ई0 में अमेरिका जैसे सांसारिक संसाधनों से मालामाल देश में दस लाख लोगों ने आत्महत्या की। मार्च 1997 में अमेरिका के एक धार्मिक सम्प्रदाय हेवेन्स गेट के 39 लोगों ने जन्...