उम्मे सलीम रज़ियल्लाहु अन्हा: ईमान, सब्र और एक महान माँ की कहानी
उम्मे सलीम रज़ियल्लाहु अन्हा इस्लामी इतिहास की उन महान महिलाओं में से हैं, जिनकी ज़िंदगी ईमान, हिकमत, सब्र और बेहतरीन तर्बियत की मिसाल है। उनकी ज़िंदगी में हमें यह सीख मिलती है कि एक महिला अपने ईमान पर मज़बूती से क़ायम रहते हुए अपने परिवार और आने वाली नस्लों के लिए कितना बड़ा किरदार अदा कर सकती है। उनकी ज़िंदगी का एक मशहूर वाक़िया उनके निकाह से जुड़ा हुआ है। जब अबू तल्हा रज़ियल्लाहु अन्हु ने उनके लिए निकाह का पैग़ाम भेजा, उस समय वह मुसलमान नहीं थे। रिश्ता अच्छा था और अबू तल्हा एक बाक़रदार शख़्स थे, लेकिन उम्मे सलीम रज़ियल्लाहु अन्हा के लिए सबसे अहम सवाल था: क्या हम दोनों का रास्ता एक है? उम्मे सलीम रज़ियल्लाहु अन्हा का मेहर क्या था? उम्मे सलीम रज़ियल्लाहु अन्हा ने अबू तल्हा रज़ियल्लाहु अन्हु से कहा: “मैं मुसलमान हूँ और तुम मुसलमान नहीं हो, इसलिए मेरे लिए तुमसे निकाह जायज़ नहीं। अगर तुम इस्लाम क़ुबूल कर लो तो वही मेरा मेहर होगा।” उन्होंने न सोना माँगा और न चाँदी। उनके लिए दुनिया की दौलत से बढ़कर ईमान था। चुनाँचे अबू तल्हा रज़ियल्लाहु अन्हु इस्लाम ले आए और यही उनका ...