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Bid'at : बिदअत की तारीफ (परिभाषा) और मज़म्मत

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बिस्मिल्लाहिर्रहमानिर्रहीम भाईयों और बहिनों! सबसे पहले ये समझना ज़रूरी है कि बिदअत क्या है? इसकी तारीफ़ रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने खुद ही फ़रमायी है, इरशादे मुबारक है “कुल्लु मुह द स तिन बिदअह” यानी दीन में हर नई बात बिदअत है। (निसाई), एक दूसरी हदीस में इरशादे मुबारक है “मन अह द स फ़ी अमरिना हाज़ा मा लइसा फीहि फहुवा रदुन” जिसने दीन में कोई ऐसा काम किया कि जिसकी बुनियाद शरीयत में नहीं वो मरदूद है। (बुखारी व मुस्लिम)। हदीसों से जो बात वाजेह हो रही है वो ये है कि हर वो को जो रसूल अकरम सल्ल0 ने अपनी मुबारक ज़िन्दगी में ना खुद किया ना उसका हुक्म दिया और ना ही किसी सहाबी को करते देखकर ख़ामोशी इख्तियार की हो (यानी उसे इजाजत दी हो) वो काम बिदअत है। मसलन रसूलुल्लाह सल्ल0 ने सहाबा-ए-किराम रजिअल्लाहु अन्हुम को अज़ान देने का तरीका खुद सिखलाया जो अल्लाहु अकबर से शुरू होती है। अगर कोई शख़्स अल्लाहु अकबर से पहले दुरूद शरीफ़ का इज़ाफा करता है तो वो दीन में नई चीज़ है, लिहाजा वो बिदअत कहलायेगी। इसी तरह मय्यत के ईसाले सवाब के लिए कुछ काम सुन्नत से साबित हैं, जैसे – सदक़ा, कुर्बानी, हज और इस्त...

Namaz : क्या मर्द और औरत की नमाज़ का तरीक़ा अलग-अलग है?

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Namaz : अज़ीज़ मुसलमान भाईयों और बहिनों, मर्द व औरत की नमाज़ में कोई फ़र्क़ नहीं हैं जिस तरह मर्द नमाज़ पढ़ते हैं ठीक उसी तरह औरत भी नमाज़ अदा करेगी, जैसा कि रसूलुल्लाह सल्ल0 ने इरशाद फरमाया कि ‘‘उसी तरह नमाज़ पढ़ना जैसा कि तुमने मुझे पढ़ते हुए देखा है’’ (सही बुख़ारी: 631), इस हदीस में दोनों (मर्द व औरत) के लिए एक समान हुक्म दिया गया है। जैसा कि कुछ मर्द व औरतें ये समझते/समझतीं हैं कि मर्द और औरत की नमाज़ का तरीक़ा अलग-अलग है तो ऐसा हरगिज़ नहीं है बल्कि रसूलुल्लाह सल्ल0 से या किसी सहाबी या सहाबिया से ऐसा कोई भी सबूत नहीं मिलता है कि मर्द और औरत की नमाज़ का तरीक़ा अलग-अलग हो। ज़रा सोचिए, अगर मर्द व औरत की नमाज़ का तरीक़ा अलग-अलग होता तो रसूलुल्लाह सल्ल0 हमें ज़रूर बताते, बल्कि आप सल्ल0 ने कभी नहीं कहा कि मर्द तुम नमाज़ ऐसे पढ़ो और औरतें तुम नमाज़ ऐसे पढ़ो। बल्कि नीचे दी गयीं हदीस की रोशनी में चन्द हिदायात से आप समझ सकते/सकतीं हैं कि हमें नमाज़ कैसे पढ़ना चाहिए-रफउल यदैन – यानी दोनों हाथों को कंधों तक उठाना नमाज़ में चार जगह साबित हैः (1) शुरू नमाज़ में, तकबीर-ए-तहरीमा के वक़्त, फिर अपने सीने पर हाथ बांधना  (2)...