कुरआन मजीद केवल तिलावत करने की किताब नहीं, बल्कि पूरी इंसानियत के लिए हिदायत, रहमत, इंसाफ, अच्छे अख़लाक और कामयाब ज़िंदगी का मार्गदर्शन है।
कुरआन हमें अल्लाह तआला की इबादत के साथ-साथ माता-पिता के साथ अच्छा व्यवहार करने, सच्चाई अपनाने, इंसाफ करने, गरीबों और जरूरतमंदों की मदद करने, यतीमों के अधिकारों की रक्षा करने, बुराई से बचने और लोगों के साथ अच्छे अख़लाक से पेश आने की शिक्षा देता है।
नीचे कुरआन मजीद की विभिन्न शिक्षाओं और आयतों के संक्षिप्त भावार्थ के रूप में 100 संदेश प्रस्तुत किए जा रहे हैं।
कुरआन हकीम के 100 संक्षिप्त संदेश
1. बातचीत के दौरान बदतमीज़ी न किया करो।
2. अपने गुस्से पर काबू रखो।
3. दूसरों के साथ भलाई करो।
4. तकब्बुर और घमंड न करो।
5. दूसरों की गलतियों को माफ कर दिया करो।
6. लोगों से नरमी और अच्छे अंदाज़ में बात करो।
7. अपनी आवाज़ नीची रखो।
8. किसी का मज़ाक न उड़ाओ।
9. माता-पिता के साथ अच्छा व्यवहार करो।
10. माता-पिता को 'उफ़' तक न कहो और उनसे सम्मान से बात करो।
11. किसी के घर या निजी स्थान में बिना अनुमति प्रवेश न करो।
12. लेन-देन और कर्ज़ के मामलों को लिख लिया करो।
13. जिस बात का ज्ञान न हो, उसकी अंधी पैरवी न करो।
14. यदि कोई कर्ज़दार कठिन परिस्थिति में हो तो उसे आसानी तक मोहलत दो।
15. ब्याज (सूद) से बचो।
16. रिश्वत और नाजायज़ तरीके से माल हासिल न करो।
17. अपने वादे पूरे करो।
18. अमानतें उनके हकदारों तक पहुँचाओ।
19. सच्चाई में झूठ न मिलाओ।
20. लोगों के बीच इंसाफ कायम करो।
21. इंसाफ के लिए मजबूती से खड़े हो जाओ, चाहे मामला अपने खिलाफ ही क्यों न हो।
22. विरासत को अल्लाह के बताए हुए नियमों के अनुसार बाँटो।
23. महिलाओं का भी विरासत में निर्धारित हिस्सा है।
24. यतीमों के माल पर कब्ज़ा न करो।
25. यतीमों के अधिकारों और संपत्ति की रक्षा करो।
26. दूसरों का माल नाजायज़ तरीके से खर्च न करो।
27. लोगों के बीच सुलह कराने की कोशिश करो।
28. बदगुमानी से बचो।
29. ग़ीबत न करो।
30. दूसरों की जासूसी न करो।
31. अल्लाह की राह में सदका और खैरात करो।
32. गरीबों और जरूरतमंदों को खाना खिलाओ।
33. जरूरतमंद लोगों को तलाश करके उनकी मदद करो।
34. फिजूलखर्ची न करो।
35. सदका देकर एहसान न जताओ।
36. मेहमानों का सम्मान करो।
37. खुद भी नेकी करो और दूसरों को भी नेकी की नसीहत करो।
38. धरती पर फसाद न फैलाओ।
39. लोगों को मस्जिदों और अल्लाह की इबादत से रोकने से बचो।
40. ज्यादती न करो और दुश्मनी में भी हद से न बढ़ो।
41. युद्ध की स्थिति में भी निर्धारित सीमाओं और नैतिक नियमों का पालन करो।
42. युद्ध के मैदान में कायरता से पीठ न दिखाओ, सिवाय युद्धनीति के उद्देश्य से पीछे हटने के।
43. धर्म के मामले में जबरदस्ती नहीं।
44. सभी नबियों और रसूलों पर ईमान लाओ।
45. मासिक धर्म के दौरान पत्नी से संभोग न करो।
46. बच्चों को दो वर्ष तक दूध पिलाने की अवधि का उल्लेख कुरआन में किया गया है।
47. ज़िना और हर प्रकार की अश्लीलता से बचो।
48. जिम्मेदारियाँ योग्य और सक्षम लोगों को सौंपो।
49. अल्लाह किसी जान पर उसकी क्षमता से अधिक बोझ नहीं डालता।
50. मुनाफिक़त (निफ़ाक़) से बचो।
51. ब्रह्मांड की रचना और अल्लाह की निशानियों पर गहराई से विचार करो।
52. पुरुषों और महिलाओं दोनों को उनके कर्मों का फल मिलेगा।
53. जिन रिश्तों में निकाह हराम किया गया है, उनसे निकाह न करो।
54. परिवार की जिम्मेदारियों को गंभीरता से निभाओ और एक-दूसरे के अधिकारों का ध्यान रखो।
55. कंजूसी से बचो।
56. दूसरों को मिली नेमतों पर ईर्ष्या न करो।
57. किसी निर्दोष व्यक्ति की नाहक हत्या न करो।
58. धोखे और विश्वासघात का समर्थन न करो।
59. गुनाह और ज्यादती के कामों में एक-दूसरे की मदद न करो।
60. नेकी और तक़वा के कामों में एक-दूसरे की मदद करो।
61. बहुमत हमेशा सत्य की कसौटी नहीं होता।
62. सीधे और सही रास्ते पर कायम रहो।
63. अपराध और सज़ा के मामलों में अल्लाह के निर्धारित न्यायपूर्ण नियमों का सम्मान करो।
64. गुनाह, ज़ुल्म और नाइंसाफी के खिलाफ हक़ का साथ दो।
65. मुरदार, खून और सूअर का मांस हराम है।
66. शराब और नशीली चीज़ों से बचो।
67. जुआ न खेलो।
68. नाप-तौल और लेन-देन में धोखाधड़ी न करो।
69. चुगली और लोगों के बीच फसाद पैदा करने वाली बातों से बचो।
70. खाओ और पियो, लेकिन इसराफ (फिजूलखर्ची) न करो।
71. नमाज़ के लिए पाकीज़गी और उचित वस्त्र का ध्यान रखो।
72. जो लोग मदद और सुरक्षा चाहते हों, उनके साथ इंसाफ और भलाई का व्यवहार करो।
73. पाकीज़गी और पवित्रता बनाए रखो।
74. अल्लाह की रहमत से कभी मायूस न हो।
75. अपनी गलतियों पर अल्लाह से माफी माँगो और तौबा करो।
76. हिकमत और अच्छी नसीहत के साथ अल्लाह की ओर बुलाओ।
77. कोई व्यक्ति किसी दूसरे के गुनाह का बोझ नहीं उठाएगा।
78. गरीबी के डर से अपनी संतान की हत्या न करो।
79. जिस चीज़ का ज्ञान न हो, उसके पीछे न पड़ो।
80. दूसरों की छिपी हुई बातों की टोह लेने से बचो।
81. किसी के घर में प्रवेश करने से पहले अनुमति लो।
82. अल्लाह पर ईमान और भरोसा रखो; अल्लाह अपने बंदों के लिए काफी है।
83. धरती पर विनम्रता और संतुलन के साथ चलो।
84. दुनिया में अपने जायज़ हिस्से और जिम्मेदारियों को पूरा करो, लेकिन आख़िरत को न भूलो।
85. अल्लाह के साथ किसी को शरीक न करो।
86. समलैंगिकता और अश्लील यौन आचरण से बचो।
87. सत्य और सही बात का साथ दो और गलत से बचो।
88. धरती पर अकड़कर और घमंड से न चलो।
89. महिलाएँ अपनी ज़ीनत और पर्दे के संबंध में अल्लाह की बताई हुई शरीअत की हिदायतों का पालन करें।
90. शिर्क से बचना अत्यंत आवश्यक है; अल्लाह शिर्क के अलावा अन्य गुनाहों को जिसके लिए चाहे माफ कर सकता है।
91. अल्लाह की रहमत से निराश न हो।
92. बुराई को बेहतर तरीके से दूर करने की कोशिश करो।
93. महत्वपूर्ण मामलों में आपसी मशवरे से निर्णय करो।
94. अल्लाह के नज़दीक सबसे अधिक सम्मानित वह है जो सबसे अधिक परहेज़गार है।
95. धर्म में ऐसी रहबानियत (संसार त्याग) न अपनाओ जिसे अल्लाह ने निर्धारित नहीं किया।
96. ज्ञान रखने वालों के सम्मान और उनकी श्रेष्ठता को पहचानो।
97. गैर-मुस्लिमों के साथ भी इंसाफ, भलाई और अच्छे अख़लाक से पेश आओ, जब तक वे तुमसे युद्ध या ज़ुल्म न करें।
98. अपने आपको लालच और कंजूसी से बचाओ।
99. अल्लाह से इस्तिग़फ़ार करो; बेशक वह बहुत क्षमा करने वाला और अत्यंत दयावान है।
100. जो व्यक्ति सवाल करे, उसे झिड़को नहीं; उसके साथ उचित और अच्छा व्यवहार करो।
कुरआन हमें क्या सिखाता है?
कुरआन मजीद की शिक्षाएँ हमें यह समझाती हैं कि इस्लाम केवल कुछ इबादतों का नाम नहीं है। इसमें अल्लाह के अधिकारों के साथ-साथ बंदों के अधिकारों का भी बहुत महत्व है।
माता-पिता के साथ अच्छा व्यवहार, यतीमों की देखभाल, गरीबों की मदद, पड़ोसियों के अधिकार, इंसाफ, सच्चाई, अमानतदारी, माफी, सब्र और अच्छे अख़लाक — ये सभी कुरआनी शिक्षाओं का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं।
अल्लाह तआला फरमाता है:
إِنَّ اللَّهَ يَأْمُرُ بِالْعَدْلِ وَالْإِحْسَانِ
अर्थ: निश्चय ही अल्लाह इंसाफ और एहसान का हुक्म देता है।
(सूरह अन-नहल: 90)
माता-पिता के बारे में अल्लाह तआला फरमाता है:
وَبِالْوَالِدَيْنِ إِحْسَانًا
अर्थ: और माता-पिता के साथ अच्छा व्यवहार करो।
(सूरह अल-इसरा: 23)
ग़ीबत के बारे में अल्लाह तआला फरमाता है:
وَلَا يَغْتَبْ بَعْضُكُمْ بَعْضًا
अर्थ: और तुममें से कोई किसी की ग़ीबत न करे।
(सूरह अल-हुजुरात: 12)
और अल्लाह की रहमत से मायूस न होने के बारे में फरमाया:
لَا تَقْنَطُوا مِن رَّحْمَةِ اللَّهِ
अर्थ: अल्लाह की रहमत से निराश न हो।
(सूरह अज़-ज़ुमर: 53)
इबादत के साथ इंसानियत भी
कुरआन मजीद हमें अल्लाह की इबादत के साथ इंसानों के अधिकारों को पूरा करने, जरूरतमंदों की मदद करने, न्याय करने और समाज में भलाई फैलाने की शिक्षा देता है।
इसलिए कुरआन को केवल पढ़ना ही नहीं, बल्कि समझना और अपनी ज़िंदगी में लागू करना भी जरूरी है।
एक पल रुककर सोचिए
हममें से बहुत से लोग रोज़ कुरआन की तिलावत करते हैं।
लेकिन क्या हम कुरआन की शिक्षाओं को अपनी बातचीत, घर-परिवार, रिश्तों, कारोबार, व्यवहार और रोज़मर्रा की ज़िंदगी में भी लागू करते हैं?
कुरआन पढ़ना हमारी जिम्मेदारी है और कुरआन पर अमल करना हमारी कामयाबी का रास्ता है।
अल्लाह तआला हमें कुरआन मजीद को समझने, उस पर ईमान रखने और उसकी शिक्षाओं पर ईमानदारी के साथ अमल करने की तौफीक़ अता फरमाए।
आमीन या रब्बुल आलमीन।
दुआ में याद रखिए।
जरूरी नोट
ऊपर दिए गए 100 बिंदु कुरआन मजीद की विभिन्न आयतों और शिक्षाओं के संक्षिप्त भावार्थ एवं संदेश के रूप में प्रस्तुत किए गए हैं। इन्हें कुरआन की 100 शब्दशः आयतें या पूर्ण अनुवाद न समझा जाए। किसी विशेष शरीअती मसले का अंतिम हुक्म जानने के लिए संबंधित कुरआनी आयत, सहीह हदीस और विश्वसनीय उलेमा की व्याख्या से रुजू करना चाहिए।
मूल संदेश/संकलन: सना उल्लाह हुसैन, इस्लामाबाद
प्रस्तुति: AIF TRUST INDIA
