بِسْمِ اللّٰهِ الرَّحْمٰنِ الرَّحِيْمِ
अल्लाह के नाम से शुरू, जो अत्यंत कृपाशील, बेहद दया करने वाला है।
सूरह अल-फ़ातिहा का परिचय
सूरह अल-फ़ातिहा पवित्र क़ुरआन की पहली सूरह है। यह मक्की सूरह है और इसमें कुल 7 आयतें हैं। इस सूरह को क़ुरआन की सबसे महान सूरहों में से एक होने का गौरव प्राप्त है।
अल-फ़ातिहा का अर्थ है 'शुरुआत' या 'खोलने वाली'। चूँकि क़ुरआन मजीद का आरंभ इसी सूरह से होता है, इसलिए इसे अल-फ़ातिहा कहा जाता है।
इस सूरह के कुछ अन्य प्रसिद्ध नाम भी हैं:
फ़ातिहतुल किताब: किताब का आरंभ।
उम्मुल क़ुरआन: क़ुरआन का सार और मूल।
अस-सब्उल मसानी: बार-बार पढ़ी जाने वाली सात आयतें।
अल-क़ुरआनुल अज़ीम: महान क़ुरआन।
अस-सलात: नमाज़।
तफ़सीर अहसनुल बयान के अनुसार इस सूरह में अल्लाह की प्रशंसा, उसकी रुबूबियत, रहमत, क़ियामत के दिन की बादशाहत, केवल उसी की इबादत और उसी से मदद माँगने तथा सीधे रास्ते की हिदायत माँगने का महत्वपूर्ण संदेश मौजूद है।
सूरह अल-फ़ातिहा का पूरा अरबी पाठ और हिंदी अनुवाद
आयत नंबर 1
بِسْمِ اللّٰهِ الرَّحْمٰنِ الرَّحِيْمِ
हिंदी अनुवाद:
अल्लाह के नाम से शुरू, जो अत्यंत कृपाशील, बेहद दया करने वाला है।
तफ़सीर अहसनुल बयान की रोशनी में व्याख्या:
बिस्मिल्लाह का अर्थ है कि मैं अल्लाह के नाम से अपना काम शुरू करता हूँ। अल्लाह के नाम से काम शुरू करना एक मुसलमान की पहचान और अच्छे आदाब में से है।
अल्लाह के दो सुंदर नाम अर-रहमान और अर-रहीम उसकी व्यापक और निरंतर रहमत को बयान करते हैं।
अर-रहमान का अर्थ है अत्यंत दयावान और अर-रहीम का अर्थ है बार-बार रहम करने वाला।
हमें अपने हर अच्छे और जायज़ काम की शुरुआत अल्लाह का नाम लेकर करनी चाहिए और उसी से बरकत की उम्मीद रखनी चाहिए।
क़ुरआन से प्रमाण:
अल्लाह तआला फरमाता है:
فَإِذَا قَرَأْتَ الْقُرْآنَ فَاسْتَعِذْ بِاللَّهِ مِنَ الشَّيْطَانِ الرَّجِيمِ
अनुवाद: जब तुम क़ुरआन पढ़ने लगो तो शैतान मरदूद से अल्लाह की पनाह माँगो।
(सूरह अन-नहल: 98)
इसलिए क़ुरआन की तिलावत शुरू करने से पहले 'अऊज़ु बिल्लाहि मिनश्शैतानिर्रजीम' पढ़ना चाहिए।
आयत नंबर 2
الْحَمْدُ لِلّٰهِ رَبِّ الْعَالَمِينَ
हिंदी अनुवाद:
हर प्रकार की प्रशंसा अल्लाह ही के लिए है, जो सारे संसारों का पालनहार है।
तफ़सीर अहसनुल बयान की रोशनी में व्याख्या:
इस आयत में अल्लाह तआला की प्रशंसा और उसकी महानता का बयान है।
'अल्हम्दु लिल्लाह' का अर्थ है कि तमाम प्रकार की तारीफ़ और प्रशंसा का वास्तविक अधिकारी केवल अल्लाह है।
इस दुनिया में जितनी भी सुंदरता, अच्छाई, नेमत और कमाल दिखाई देता है, सब अल्लाह की पैदा की हुई चीज़ें हैं। इसलिए वास्तविक प्रशंसा का अधिकारी भी वही है।
'रब्बुल आलमीन' का अर्थ है सारे संसारों का पालनहार।
अल्लाह केवल इंसानों का ही नहीं, बल्कि जिन्न, फ़रिश्तों, जानवरों, परिंदों और तमाम मख़लूक़ का पालनहार है। वह हर मख़लूक़ की ज़रूरतों को जानता है और उसे उसकी ज़रूरत के अनुसार रोज़ी और साधन प्रदान करता है।
क़ुरआन से प्रमाण:
अल्लाह तआला फरमाता है:
وَمَا بِكُم مِّن نِّعْمَةٍ فَمِنَ اللَّهِ
अनुवाद: तुम्हारे पास जो भी नेमत है, वह अल्लाह ही की ओर से है।
(सूरह अन-नहल: 53)
सहीह हदीस:
रसूलुल्लाह ﷺ ने फरमाया कि अल्लाह इस बात से खुश होता है कि बंदा खाना खाए तो उसकी प्रशंसा करे और कुछ पिए तो उसकी प्रशंसा करे।
(सहीह मुस्लिम: 2734)
इससे हमें सीख मिलती है कि हर नेमत पर अल्लाह का शुक्र अदा करना चाहिए।
आयत नंबर 3
الرَّحْمٰنِ الرَّحِيْمِ
हिंदी अनुवाद:
जो अत्यंत कृपाशील, बेहद दया करने वाला है।
तफ़सीर अहसनुल बयान की रोशनी में व्याख्या:
इस आयत में अल्लाह तआला की रहमत और दया का बयान है।
अल्लाह का नाम अर-रहमान उसकी व्यापक रहमत को दर्शाता है। दुनिया में उसकी रहमत से मुसलमान और गैर-मुस्लिम सभी लाभ उठाते हैं। वह सबको रोज़ी देता है, जीवन प्रदान करता है और अपनी अनगिनत नेमतों से नवाज़ता है।
अर-रहीम उसकी विशेष और निरंतर रहमत को बयान करता है। आख़िरत में उसकी विशेष रहमत ईमान वालों के लिए होगी।
अल्लाह की रहमत बहुत व्यापक है। इंसान को कभी भी उसकी रहमत से निराश नहीं होना चाहिए।
क़ुरआन से प्रमाण:
अल्लाह तआला फरमाता है:
وَرَحْمَتِي وَسِعَتْ كُلَّ شَيْءٍ
अनुवाद: और मेरी रहमत हर चीज़ को घेरे हुए है।
(सूरह अल-आराफ़: 156)
एक दूसरी जगह अल्लाह तआला फरमाता है:
لَا تَقْنَطُوا مِن رَّحْمَةِ اللَّهِ
अनुवाद: अल्लाह की रहमत से निराश न हो।
(सूरह अज़-जुमर: 53)
इसलिए चाहे इंसान से कितनी ही गलतियाँ हो जाएँ, उसे सच्चे दिल से तौबा करके अल्लाह की ओर लौटना चाहिए।
आयत नंबर 4
مَالِكِ يَوْمِ الدِّينِ
हिंदी अनुवाद:
बदले और हिसाब-किताब के दिन (क़ियामत) का मालिक है।
तफ़सीर अहसनुल बयान की रोशनी में व्याख्या:
इस आयत में क़ियामत के दिन अल्लाह तआला की पूर्ण बादशाहत और उसके न्याय का बयान है।
हालाँकि दुनिया में भी हर चीज़ का वास्तविक मालिक अल्लाह ही है, लेकिन क़ियामत के दिन उसकी बादशाहत और अधिकार का पूर्ण रूप से प्रकट होना सबके सामने आ जाएगा।
उस दिन हर इंसान को उसके कर्मों के अनुसार बदला दिया जाएगा। किसी पर ज़ुल्म नहीं किया जाएगा और कोई व्यक्ति अपने कर्मों से बचकर नहीं निकल सकेगा।
उस दिन न किसी की दौलत काम आएगी और न ही दुनिया का पद और प्रतिष्ठा। हर व्यक्ति को अपने कर्मों का हिसाब देना होगा।
क़ुरआन से प्रमाण:
अल्लाह तआला फरमाता है:
لِّمَنِ الْمُلْكُ الْيَوْمَ ۖ لِلَّهِ الْوَاحِدِ الْقَهَّارِ
अनुवाद: आज किसकी बादशाहत है? केवल एक अल्लाह की, जो सब पर प्रभुत्व रखने वाला है।
(सूरह ग़ाफ़िर: 16)
एक दूसरी जगह फरमाया:
فَمَن يَعْمَلْ مِثْقَالَ ذَرَّةٍ خَيْرًا يَرَهُ وَمَن يَعْمَلْ مِثْقَالَ ذَرَّةٍ شَرًّا يَرَهُ
अनुवाद: जिसने ज़र्रा बराबर भी नेकी की होगी, वह उसे देख लेगा और जिसने ज़र्रा बराबर भी बुराई की होगी, वह उसे देख लेगा।
(सूरह अज़-ज़लज़ला: 7-8)
आयत नंबर 5
إِيَّاكَ نَعْبُدُ وَإِيَّاكَ نَسْتَعِينُ
हिंदी अनुवाद:
हम केवल तेरी ही इबादत करते हैं और केवल तुझी से मदद माँगते हैं।
तफ़सीर अहसनुल बयान की रोशनी में व्याख्या:
यह सूरह की अत्यंत महत्वपूर्ण आयत है। इसमें तौहीद और इबादत के मूल सिद्धांत को बयान किया गया है।
इबादत का अर्थ है अल्लाह के प्रति पूर्ण प्रेम, आज्ञाकारिता, विनम्रता और भय के साथ बंदगी करना।
इस आयत में बंदा अल्लाह के सामने यह वादा करता है कि वह केवल उसी की इबादत करेगा और उसी को अपनी वास्तविक मदद का अधिकारी मानेगा।
इबादत की कोई भी ऐसी विशेष क्रिया, जो केवल अल्लाह का अधिकार है, किसी दूसरे के लिए करना जायज़ नहीं है।
इसी तरह ऐसी मदद माँगना जो केवल अल्लाह के अधिकार में है और जिसे कोई मख़लूक़ सामान्य साधनों से पूरा नहीं कर सकती, अल्लाह के अलावा किसी से माँगना जायज़ नहीं।
हाँ, सामान्य सांसारिक कार्यों में किसी जीवित व्यक्ति से ऐसी मदद माँगना जो वह कर सकता हो, जायज़ है। जैसे डॉक्टर से इलाज में मदद लेना, किसी से सामान उठाने में मदद लेना या किसी से रास्ता पूछना। यह सामान्य सहयोग है, शिर्क नहीं।
क़ुरआन से प्रमाण:
अल्लाह तआला फरमाता है:
وَأَنَّ الْمَسَاجِدَ لِلَّهِ فَلَا تَدْعُوا مَعَ اللَّهِ أَحَدًا
अनुवाद: और मस्जिदें अल्लाह ही के लिए हैं, इसलिए अल्लाह के साथ किसी और को न पुकारो।
(सूरह अल-जिन्न: 18)
एक दूसरी जगह अल्लाह तआला फरमाता है:
وَتَعَاوَنُوا عَلَى الْبِرِّ وَالتَّقْوَىٰ
अनुवाद: नेकी और तक़वा के कामों में एक-दूसरे की मदद करो।
(सूरह अल-माइदा: 2)
इन आयतों से स्पष्ट होता है कि इबादत केवल अल्लाह के लिए है, जबकि सामान्य सांसारिक कार्यों में एक-दूसरे का सहयोग करना जायज़ और प्रशंसनीय है।
आयत नंबर 6
اهْدِنَا الصِّرَاطَ الْمُسْتَقِيمَ
हिंदी अनुवाद:
हमें सीधा रास्ता दिखा।
तफ़सीर अहसनुल बयान की रोशनी में व्याख्या:
इस आयत में बंदा अल्लाह से सीधे रास्ते की हिदायत माँगता है।
हिदायत का अर्थ केवल रास्ता बता देना ही नहीं, बल्कि उस रास्ते पर चलने की तौफ़ीक़ देना और उस पर मज़बूती से कायम रखना भी है।
इंसान चाहे कितना ही बुद्धिमान क्यों न हो, उसे हर समय अल्लाह की हिदायत की आवश्यकता रहती है।
सीधा रास्ता वह रास्ता है जो इस्लाम है और जिसे अल्लाह के रसूल मुहम्मद ﷺ ने हमारे सामने पेश किया। आज यह रास्ता क़ुरआन और सहीह हदीस में सुरक्षित है।
इसलिए हर मुसलमान को दिन-रात अल्लाह से हिदायत की दुआ करते रहना चाहिए।
क़ुरआन से प्रमाण:
अल्लाह तआला फरमाता है:
وَأَنَّ هَٰذَا صِرَاطِي مُسْتَقِيمًا فَاتَّبِعُوهُ
अनुवाद: और निःसंदेह यही मेरा सीधा रास्ता है, इसलिए तुम इसी का अनुसरण करो।
(सूरह अल-अनआम: 153)
इस आयत से मालूम हुआ कि सीधा रास्ता अल्लाह का बताया हुआ रास्ता है, न कि इंसान की अपनी बनाई हुई राह।
आयत नंबर 7
صِرَاطَ الَّذِينَ أَنْعَمْتَ عَلَيْهِمْ غَيْرِ الْمَغْضُوبِ عَلَيْهِمْ وَلَا الضَّالِّينَ
हिंदी अनुवाद:
उन लोगों का रास्ता जिन पर तूने अपना इनाम किया, न कि उन लोगों का जिन पर तेरा ग़ज़ब हुआ और न ही उन लोगों का जो गुमराह हो गए।
तफ़सीर अहसनुल बयान की रोशनी में व्याख्या:
इस आयत में अल्लाह तआला ने सीधे रास्ते की पहचान भी बता दी है।
सीधा रास्ता उन लोगों का रास्ता है जिन पर अल्लाह ने अपना इनाम और कृपा की है।
ये वे लोग हैं जिन्होंने अल्लाह और उसके रसूल की आज्ञा का पालन किया और सत्य के रास्ते पर चलते रहे।
अल्लाह के इनाम पाने वाले लोगों का वर्णन सूरह अन-निसा की आयत 69 में किया गया है।
अल्लाह तआला फरमाता है:
وَمَن يُطِعِ اللَّهَ وَالرَّسُولَ فَأُولَٰئِكَ مَعَ الَّذِينَ أَنْعَمَ اللَّهُ عَلَيْهِم مِّنَ النَّبِيِّينَ وَالصِّدِّيقِينَ وَالشُّهَدَاءِ وَالصَّالِحِينَ ۚ وَحَسُنَ أُولَٰئِكَ رَفِيقًا
अनुवाद: और जो कोई अल्लाह और रसूल की आज्ञा का पालन करेगा, तो ऐसे लोग उन लोगों के साथ होंगे जिन पर अल्लाह ने इनाम किया है, अर्थात नबियों, सिद्दीक़ों, शहीदों और नेक लोगों के साथ। और ये कितने अच्छे साथी हैं।
(सूरह अन-निसा: 69)
मग़ज़ूब अलैहिम और ज़ाल्लीन से क्या मुराद है?
तफ़सीर अहसनुल बयान में मुनक़ूल मफ़स्सिरीन की व्याख्या के अनुसार 'मग़ज़ूब अलैहिम' से यहूदी और 'ज़ाल्लीन' से ईसाई मुराद हैं।
यहाँ इसका उद्देश्य केवल किसी समुदाय का नाम लेना नहीं, बल्कि उन गुमराहियों से बचने की शिक्षा देना है जिनमें सत्य को जानकर उसका विरोध करना और ज्ञान के बिना भटक जाना शामिल है।
यहूदी समुदाय की प्रमुख गुमराही सत्य को जानने के बावजूद उसका विरोध करना और उसके आदेशों में फेरबदल करना थी।
ईसाइयों की प्रमुख गुमराही हज़रत ईसा अलैहिस्सलाम के बारे में हद से बढ़ जाना और उन्हें अल्लाह का बेटा या ईश्वरत्व में साझीदार मानना था।
इसलिए एक मुसलमान को सत्य का ज्ञान प्राप्त करके उस पर अमल करना चाहिए और न ही जानबूझकर सत्य का विरोध करना चाहिए और न ही बिना ज्ञान के किसी रास्ते पर चलना चाहिए।
सहीह हदीस:
जब सूरह अल-फ़ातिहा के अंत में 'वला-द्दाल्लीन' पढ़ा जाए तो आमीन कहना चाहिए।
रसूलुल्लाह ﷺ ने फरमाया:
जब इमाम आमीन कहे तो तुम भी आमीन कहो। जिस व्यक्ति की आमीन फ़रिश्तों की आमीन के साथ मिल जाएगी, उसके पिछले गुनाह माफ़ कर दिए जाएंगे।
(सहीह अल-बुख़ारी: 780-782, रिवायत के संस्करण के अनुसार नंबरिंग में अंतर हो सकता है।)
सूरह अल-फ़ातिहा की फज़ीलत: सहीह हदीस की रोशनी में
सूरह अल-फ़ातिहा की महानता और महत्व अनेक सहीह हदीसों से साबित है।
1. सूरह अल-फ़ातिहा क़ुरआन की सबसे महान सूरह है
हज़रत अबू सईद बिन मुअल्ला रज़ियल्लाहु अन्हु बयान करते हैं कि रसूलुल्लाह ﷺ ने उनसे फरमाया:
क्या मैं तुम्हें क़ुरआन की सबसे महान सूरह न सिखाऊँ?
फिर आपने फरमाया:
अल्हम्दु लिल्लाहि रब्बिल आलमीन। यही सात बार दोहराई जाने वाली आयतें हैं और महान क़ुरआन है जो मुझे दिया गया है।
हवाला: सहीह अल-बुख़ारी: 5006।
2. सूरह अल-फ़ातिहा के बिना नमाज़ नहीं होती
रसूलुल्लाह ﷺ ने फरमाया:
لَا صَلَاةَ لِمَنْ لَمْ يَقْرَأْ بِفَاتِحَةِ الْكِتَابِ
अनुवाद: जिस व्यक्ति ने सूरह फ़ातिहा नहीं पढ़ी, उसकी नमाज़ नहीं हुई।
हवाला: सहीह अल-बुख़ारी: 756।
सहीह मुस्लिम की हदीस 395 में भी सूरह फ़ातिहा के बिना नमाज़ के अधूरे होने का बयान आया है।
नोट: इमाम के पीछे फ़ातिहा पढ़ने के तरीके और उसके फ़िक़्ही विवरण में उलमा के बीच मतभेद है। इसलिए इस मसले में किसी एक मत को सर्वसम्मत निर्णय बताना सही नहीं होगा।
3. सूरह अल-फ़ातिहा एक विशेष दुआ और अल्लाह से बातचीत है
हज़रत अबू हुरैरा रज़ियल्लाहु अन्हु से रिवायत है कि रसूलुल्लाह ﷺ ने फरमाया कि अल्लाह तआला ने फरमाया:
मैंने नमाज़ (यहाँ सूरह फ़ातिहा) को अपने और अपने बंदे के बीच दो हिस्सों में बाँट दिया है और मेरे बंदे को वह मिलेगा जो वह माँगता है।
जब बंदा कहता है:
الْحَمْدُ لِلَّهِ رَبِّ الْعَالَمِينَ
तो अल्लाह फरमाता है: मेरे बंदे ने मेरी प्रशंसा की।
जब बंदा कहता है:
الرَّحْمَٰنِ الرَّحِيمِ
तो अल्लाह फरमाता है: मेरे बंदे ने मेरी प्रशंसा की।
जब बंदा कहता है:
مَالِكِ يَوْمِ الدِّينِ
तो अल्लाह फरमाता है: मेरे बंदे ने मेरी बड़ाई बयान की।
और जब बंदा कहता है:
إِيَّاكَ نَعْبُدُ وَإِيَّاكَ نَسْتَعِينُ
तो अल्लाह फरमाता है: यह मेरे और मेरे बंदे के बीच है और मेरे बंदे को वह मिलेगा जो उसने माँगा।
इसके बाद जब बंदा सीधे रास्ते की दुआ करता है तो अल्लाह उसकी दुआ का जवाब देता है।
हवाला: सहीह मुस्लिम: 395।
यह हदीस हमें बताती है कि नमाज़ में सूरह फ़ातिहा पढ़ते समय हमें उसके अर्थ पर भी ध्यान देना चाहिए।
4. सूरह अल-फ़ातिहा से दम करना जायज़ है
हज़रत अबू सईद ख़ुदरी रज़ियल्लाहु अन्हु से रिवायत है कि कुछ सहाबा एक क़बीले के पास गए। उस क़बीले के लोगों ने उनकी मेहमाननवाज़ी नहीं की। बाद में उस क़बीले के सरदार को साँप ने काट लिया या बिच्छू ने डंक मार दिया।
उन लोगों ने सहाबा से इलाज और दम करने के बारे में पूछा।
सहाबा में से एक ने सूरह अल-फ़ातिहा पढ़कर दम किया। अल्लाह के हुक्म से वह सरदार ठीक हो गया।
जब सहाबा ने यह मामला रसूलुल्लाह ﷺ के सामने रखा तो आपने इसे सही माना।
हवाला: सहीह अल-बुख़ारी: 5736।
इस हदीस से मालूम होता है कि क़ुरआन की आयतों के माध्यम से शरीअत के अनुसार रुक़्या करना जायज़ है। शिफ़ा देने वाला केवल अल्लाह है।
सूरह अल-फ़ातिहा से मिलने वाली महत्वपूर्ण शिक्षाएँ
इस महान सूरह से हमें कई महत्वपूर्ण बातें सीखने को मिलती हैं:
हर अच्छे काम की शुरुआत अल्लाह के नाम से करनी चाहिए।
सारी प्रशंसा और शुक्र केवल अल्लाह के लिए है।
अल्लाह ही सारे संसारों का पालनहार है।
अल्लाह की रहमत बहुत व्यापक है।
क़ियामत के दिन हर इंसान को अपने कर्मों का हिसाब देना होगा।
इबादत केवल अल्लाह की करनी चाहिए।
वास्तविक और ग़ैबी सहायता केवल अल्लाह से माँगनी चाहिए।
सामान्य सांसारिक कार्यों में एक-दूसरे की मदद करना जायज़ है।
हर समय अल्लाह से सीधे रास्ते की हिदायत माँगनी चाहिए।
नबियों, सिद्दीक़ों, शहीदों और नेक लोगों के रास्ते पर चलना चाहिए।
जानबूझकर सत्य का विरोध करने और बिना ज्ञान के भटकने से बचना चाहिए।
नमाज़ में सूरह फ़ातिहा के अर्थ और संदेश को समझकर पढ़ना चाहिए।
निष्कर्ष
सूरह अल-फ़ातिहा केवल नमाज़ में पढ़ी जाने वाली सात आयतें नहीं हैं, बल्कि यह इस्लाम के मूल संदेश का सार है।
इसमें अल्लाह की प्रशंसा, उसकी रहमत, उसकी बादशाहत, तौहीद, इबादत, अल्लाह पर भरोसा और सीधे रास्ते की दुआ शामिल है।
हमें चाहिए कि हम सूरह अल-फ़ातिहा को केवल ज़ुबान से न पढ़ें, बल्कि इसके अर्थ को समझें और अपनी ज़िंदगी में इसके संदेश को अपनाएँ।
अल्लाह तआला हमें क़ुरआन को सही तरीके से पढ़ने, समझने और उस पर अमल करने की तौफ़ीक़ अता फरमाए।
آمِين يَا رَبَّ الْعَالَمِينَ
तफ़सीर और हदीस के प्रमुख संदर्भ
तफ़सीर:
तफ़सीर अहसनुल बयान – सूरह अल-फ़ातिहा, आयत 1 से 7।
तफ़सीर के लेखक: मौलाना सलाहुद्दीन यूसुफ रहिमहुल्लाह।
क़ुरआन के संदर्भ:
सूरह अन-नहल: 98
सूरह अन-नहल: 53
सूरह अल-आराफ़: 156
सूरह अज़-जुमर: 53
सूरह ग़ाफ़िर: 16
सूरह अज़-ज़लज़ला: 7-8
सूरह अल-जिन्न: 18
सूरह अल-माइदा: 2
सूरह अल-अनआम: 153
सूरह अन-निसा: 69
सहीह हदीस के संदर्भ:
सहीह अल-बुख़ारी: 756 – फ़ातिहा के बिना नमाज़।
सहीह अल-बुख़ारी: 5006 – सूरह फ़ातिहा की महानता।
सहीह मुस्लिम: 395 – नमाज़ और सूरह फ़ातिहा का महत्व।
सहीह अल-बुख़ारी: 5736 – सूरह फ़ातिहा से दम।
सहीह अल-बुख़ारी: 780-782 – आमीन कहने की फ़ज़ीलत।
लेख का आधार: तफ़सीर अहसनुल बयान, क़ुरआन मजीद और सहीह अहादीस।
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