Women's Human Rights : औरतों के इंसानी अधिकार (हुकूक)
Women’s Human Rights : अज़ीज़ साथियों! इस्लाम ने औरतों को बहुत बुलंद मक़ाम दिया और औरतों के अधिकारों में कोई कमी भी नहीं रखी है लेकिन आज समाज में औरतों को उनके अधिकारों से महरूम रखा जाता है जो कि एक संगीन जुर्म और बड़ा गुनाह है, इसी संबंध में आज हम आपको कुरआन की रोशनी में औरतों के अधिकारों के विषय पर बहुत ही अहम जानकारी दे रहे हैं ताकि हम औरतों के इंसानी अधिकारों को अच्छी तरह समझ लें और अमली जामा पहनाने की कोशिश कर सकें.
मर्द और औरत एक ही तरह यानी मानव जाति से संबंध रखते हैं लिहाज़ा इंसान की हैसियत से दोनों एक जैसे हैं। जैसा कि कुरआन मजीद की सूरह निसा की आयत नं0 1 में अल्लाह तआला ने इरशाद फ़रमाया है-
“ऐ लोगो! अपने रब (पालनहार) से डरो जिसने तुम्हें ऐ जान से पैदा किया और उसी जान से उसका जोड़ा बनाया फिर दोनों से बहुत से मर्द और औरतें दुनिया में फैला दीं।”
चुनांचे तमाम मर्द और औरतें एक ही मां-बाप की औलाद हैं लिहाज़ा इंसानी हैसियत से दोनों एक दूसरे के बराबर दर्जे रखते हैं, जैसा कि कुरआन मजीद की सूरह हुजुरात की आयत नं0 13 में अल्लाह सुब्हानहु व तआला ने इरशाद फ़रमाया-
“ऐ लोगो! हमने तुम्हें एक मर्द और एक औरत से पैदा किया फिर तुम्हारे कुन्बे कबीले बनाए ताकि तुम एक दूसरे को पहचानो बेशक अल्लाह के नज़दीक ज़्यादा इज़्ज़त वाला वह है जो सबसे ज़्यादा डरने वाला है (चाहे मर्द हो या औरत)। बेशक अल्लाह तआला सब कुछ जानता है।”
लिहाज़ा इस्लाम की निगाह में इंसान होने की हैसियत से औरत की जान भी उतनी ही कीमती है जितनी मर्द की जान कीमती है मतलब साफ है कि आदम की तमाम औलाद की जान एक जैसी कीमती है चाहे वह किसी भी नस्ल, ज़बान, रंग, वतन और ताल्लुक रखते हों। मुस्लिम समाज में औरत भी उसी इज्जत और सम्मान की हकदार है जिस इज़्ज़त और सम्मान का हकदार मर्द है, और जिस तरह औरत पर मर्द का यह अधिकार है कि वह शौहर की आज्ञा का पालन करे उसी तरह मर्द पर भी औरत का यह अधिकार है कि वह अपनी बीबी का ध्यान रखे । जैसा कि सूरह बकरा की आयत नं0 187 में अल्लाह तआला का फरमान है-
“तुम्हारी बीबियां तुम्हारा लिबास हैं और तुम उनका लिबास हो।” “औरतों के लिए भी वैसे ही अधिकार हैं जिस तरह मर्दो के औरतों पर अधिकार हैं।”
और जो लोग औरत को बहुत मामूली और अपने लिए शर्म की बात समझते हैं फिर उन पर जुल्म व ज़्यादती करते हैं वे यकीनन बहुत बड़ा गुनाह करते हैं जैसा कि अल्लाह तआला ने सूरह तकवीर की आयत 8-9 में इरशाद फ़रमाया है”और जब जिंदा गाड़ी हुई लड़की से सवाल किया जाएगा कि वह क्यों कत्ल की गई?” चुनांचे अपनी-अपनी जिम्मेदारियों के हिसाब से शरीअते इस्लामिया ने जिस तरह मर्दो के अधिकारों का खुलासा किया है उसी तरह औरतों के अधिकारों का खुलासा भी किया है जैसा कि अल्लाह रब्बुल आलमीन ने सूरह बकरा की आयत नं0 228 में इरशाद फरमाया है
लिहाज़ा औरतों के साथ नाइंसाफी और उनको उनके अधिकारों (हुकूक) से हरगिज़ महरूम नहीं करना चाहिए, बल्कि इज़्ज़त के साथ उनके पूरे अधिकार (हुकूक) अदा करना चाहिए, क्योंकि अल्लाह तआला ने औरतों को बहुत बड़ा मकाम अता फरमाया है। अल्लाह तआला हम सभी को अमल की तौफीक अता फरमाए, आमीन! ।
