Wandering and Morality : आवारगी और अख़्लाक़ : Time never come back 



Wandering and Morality : मेरे प्रिय पाठकगण, अस्सलामु अलैकुम व रह मतुल्लाहि व ब रका तुहू! इस पोस्ट में हम अपने प्यारे और भोले भाले नौजवानों को आवारगी और अख़लाक़ (Wandering and Morality) के विषय पर निम्नलिखित ऐसी बातों और कामों से अवगत कराना चाहते हैं जिनका जानना आपके लिए अत्यन्त आवश्यक एवं महत्वपूर्ण है। और वो ये हैं – Now let’s start : Wandering and Morality

आवारगी (Wandering)

आजकल बेहयाई (निर्लज्जता) ज़ोरों पर है। मां-बाप की शर्म और अल्लाह का ख़ौफ़ दोनों ही नहीं हैं। बस ऐश करने की धुन सवार है। बनाव-सिंगार करके लड़कियां बाजा़रों में आज़ादी से घूमती फिरती हैं और लड़के इनका ताक़्कु़ब (पीछा) करते हैं। दोनों एक-दूसरे को बुरी नज़रों से देखते हैं और दिल कहता है कि आपस में दोस्ती कर लो और एक दूसरे के जिस्म से लज़्ज़त हासिल करो, मेरे मासूम दोस्तों, फिर आप बुरे लोगों के झांसे में आकर यह समझने लगते हैं कि फ़्लां बहुत ख़ूबसूरत है। इसलिए सारा-सारा दिन उसके ताक़्कु़ब में आवारागर्दी करते हैं और रातों को भी उसके ख़्याल ही में सोते और ख़्वाब देखते हैं, जिसका नतीजा यह होता है कि रफ़्ता-रफ़्ता आपकी सेहत बर्बाद होने लगती है। वक़्त भी बर्बाद होता है। लिखने-पढ़ने को दिल नहीं चाहता और इस आवारागर्दी की वजह से एक न एक दिन आख़िर अपनी और अपने ख़ानदान की नाक कटवा बैठते हैं। ऐसे लड़कों की मिसाल उस मुसाफ़िर की-सी है, जो स्टेशन पर पहुंचने की बजाय रास्ते ही में खेल-तमाशे देखता रहे और गाड़ी निकल जाने के बाद स्टेशन पर पहुंचे। ग़र्ज़ नौजवान लड़कों और लड़कियों के चक्कर में फंस कर अपनी उम्र और सेहत का सुनहरा हिस्सा ज़ाया कर देते हैं और बाद में सारी उम्र पछताते रहते हैं। मगर गया वक़्त फिर हाथ आता नहीं।

नौजवान दोस्तों, उम्र का यही बेहतरीन हिस्सा है, जिसमें आप अपनी सेहत बना सकते हैं। वर्जिश करके तन्दुरुस्ती को महफूज़ (सुरक्षित) रख सकते हैं। खेलों के ज़रिए दुनिया में नाम पैदा कर सकेत हैं। इल्म हासिल करके अपना मुस्तक़्बिल शानदान बना सकते हैं, मुख़्तलिफ़ (भिन्न) फ़न (कलाएं) सीख सकते हैं। अगर आपने इस उम्र को यूं ही आवारागर्दी में ज़ाया कर दिया, तो फिर यह मौक़ा (अवसर) जिंदगी भर हाथ न आएगा। इस आवारगी के नतीजे में अहतेलाम ज़्यादा होने लगता है। परेशानी की वजह से सेहत, प्यास, नींद और सुकून बर्बाद हो जाता है। पढ़ने-लिखने में दिल बिल्कुल नहीं लगता। घर वाले भी बेज़ार (रुष्ट) हो जाते हैं स्कूलों में बदनामी होती है। अच्छे दोस्त और मुहल्ले वाले नफ़रत की निगाह से देखते हैं और मां-बाप की इज़्ज़त बर्बाद हो जाती है।

याद रखिए, अगर किसी लड़की से आपकी दोस्ती हो जाए और आप समझें कि उससे लुत्फ़ उठाने या शादी कर लेने में बड़ा मज़ा है, तो यक़ीन जानिए आप बिल्कुल नादान हैं। क्योंकि जो शादी वालिदैन की मर्ज़ी के ख़िलाफ़ होती है वह मुख्यत: कामयाब नहीं होती और अगर आप ब-ज़िद (हठधर्मी से) होकर उससे शादी कर भी लें तो चंद महीनों के बाद आपको एक दूसरे से नफ़रत (घृणा) हो जाएगी और फिर ज़िंदगी का मज़ा ख़ाक में मिल जाएगा। यह हरगिज़ न भूलिए कि अल्लाह और उसके रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के अहकामात की नाफरमानी करके और अपने मां-बाप की इज़्ज़तत ख़ाक में मिलाकर आपसे नाजाइज़ (अनुचित) ताल्लुक़ात पैदा कर सकती है, वह किसी दिन भी आपकी इज़्ज़त बर्बाद करके किसी दूसरे की बीवी या महबूबा बन सकती है । जब जवानी का उबाल उतर जाता है, दोनों मियां-बीवी बनकर रहने लगते हैं और घर-बार की ज़िम्मेदारियां सर पर आन पड़ती हैं, तो दोनों की असलियत (वास्तविकता) ज़ाहिर होने लगती है। इससे पहले दोनों एक दूसरे को अच्छे से अच्छा बनकर दिखाई देने की कोशिश किया करते थे और उनके ऐब और नुक्स (दोष) छुपे रहते थे। लेकिन अब चौबीस घंटे के मेल-मिलाप से उनकी छुपी हुई बुराइयां, कमजो़रियां और बेवकूफ़ियां ज़ाहिर होने लगती हैं और दोनों में तू-तू मैं-मैं होने लगती है। याद रखिए, हर चमकने वाली चीज़ सोना नहीं होती और न ही हर महबूबा अच्छी बीवी बन सकती है। चुनांचे आपने अख़बारों में पढ़ा होगा कि यूरोप में तलाक़, ख़ुदकशी और बोरियत का बहुत ज़ोर है और उसकी वजह सिर्फ़ यह है कि लड़के-लड़कियां नौजवानी में ऐशो-इशरत करते रहते हैं और बाद में एक दूसरे की सूरत तक से बेज़ार हो जाते हैं।

आवारगी और अख़्लाक़ के मुताल्लिक़ हम आपको अल्लाह और उसके रसूले मक़बूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के इरशादात (निर्देश) बताते हैं। आप उन्हें याद रखें और उन पर अमल करें, ताकि इस दुनिया में भी अमन (रक्षा) और मुसर्रत की ज़िंदगी गुज़ार सकें और आख़िरत में भी आपको कामयाबी नसीब हो।

अख़्लाक़ (Morality)

1. हर दीन का एक मुमताज़ (प्रसिद्ध) अख़्लाक़ होता है और इस्लाम का मुमताज़ अख़्लाक़ शर्म करना है।
2. हया (मर्यादा) भी ईमान की शाख़ों (श्रेणियों) में से एक शाख़ है।
3. हया और ईमान साथ-साथ हैं। जब एक चीज़ गई तो समझो कि दूसरी भी गई।
4. बदकारी ऐब है। हया ज़ीनत है। जिसमें बदकारी होगी, ऐब ज़ाहिर हो जाएगा। मगर हयादार में ज़ीनत की ख़ूबी पैदा होगी।
5. हया यह है कि ख़्यालात पर पूरा-पूरा क़ाबू (नियंत्रण) रखा जाए। पेट को हराम से बचाया जाए। मौत को याद रखा जाए। क़ब्र में हड्डियों के घुल जाने का ध्यान रखा जाए। जो शख़्स आख़िरत का इरादा रखता है, वह दुनिया की ज़ीनत और ऐश त्याग दे। जिसने यह काम किए उसने अल्लाह की हया का हक़ अदा किया।
6. अगर गै़र औरत पर अचानक नज़र पड़ जाए तो फ़ौरन मुंह फेर लो।
7. याद रखो, अगर अजनबी औरत पर नज़र पड़ जाए, तो फिर उसको दोबारा न देखो, क्योंकि दोबारा देखना गुनाह है और ऐसी आंख में क़यामत के दिन पिघला हुआ सीसा डाला जाएगा।
8. जो आदमी की नज़र गै़र औरत पर पड़ी मगर उसने फ़ौरन निगाह दूसरी तरफ़ फेरी, तो अल्लाह तआला उसको ईमान की मिठास और इबादत का लुत्फ़ अता करता है।
9. औरत छुपाने के क़ाबिल (योग्य) है। इसलिए जब औरत बेपर्दा होकर बाहर निकलती है, तो शैतान उसकी तरफ़ देखने के लिए मर्दों को राग़िब (ध्यान) करता है
10. गै़र मर्दों को देखने वाली औरत और गै़र औरतों को देखने वाले मर्दों पर हुज़ूर सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने लानत भेजी है।
11. न मर्द, मर्द के साथ एक चादर में सोए और न औरत, औरत के साथ एक चादर में सोए।
12. जिसने गै़र औरत की तरफ़ बुरी नज़र से देखा, वह दिल में ज़िना करेगा।
13. ज़िना गुनाहे कबीरा है और ज़ानी मर्द और ज़ानिया औरत के लिए सख़्त सज़ा है।

हम आशा करते हैं कि आप लोग उपरोक्त बातों पर ज़रुर अमल करेंगे और इन बातों को दूसरों तक पहुँचाने में हमारी मदद भी करेंगे। अल्लाह हम सभी को अमल की तौफ़ीक़ अता फ़रमाऐ, आमीन!

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